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कभी पेड़ों से गिरकर बर्बाद होने वाला फल अब बना जशपुर के किसानों के लिए 'काला सोना', किसानों की बढ़ी आमदनी, दूसरे राज्यों में बढ़ी मांग


पत्थलगांव(जशपुर) छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में इस वर्ष जामुन की बंपर पैदावार ने स्थानीय किसानों की किस्मत बदल दी है। कभी उपेक्षित रहने वाला और पेड़ों से गिरकर बर्बाद हो जाने वाला यह मौसमी फल अब यहाँ के ग्रामीण और आदिवासी किसानों के लिए मुनाफे का एक बड़ा जरिया बनकर उभरा है।

बूढ़ाडाँड़ क्षेत्र बना जामुन का प्रमुख केंद्र

जिले के पत्थलगांव और विशेष रूप से बूढ़ाडाँड़ क्षेत्र के सैकड़ों किसानों के लिए यह सीजन बेहद शानदार साबित हो रहा है। पत्थलगांव के जामुन अपनी खास मिठास, बड़े आकार और बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। इस साल अनुकूल मौसम के कारण जामुन की पैदावार बहुत अच्छी हुई है, जिससे बाजारों में इसकी भारी आवक देखी जा रही है।

लोकल से ग्लोबल: दूसरे राज्यों तक पहुंच रही है खेप

पत्थलगांव के इस जामुन की मांग अब केवल छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं रह गई है। यहाँ के जामुन की मिठास के चर्चे पड़ोसी राज्यों में भी हैं। व्यापारियों द्वारा यहाँ से भारी मात्रा में जामुन खरीदकर ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के बड़े शहरों में भेजा जा रहा है। बाहरी राज्यों के व्यापारी सीधे गांवों में पहुंचकर किसानों से अच्छी कीमत पर जामुन खरीद रहे हैं।

आर्थिक सशक्तिकरण का जरिया बना जामुन

कुछ साल पहले तक इस फल के सही बाजार और रखरखाव की कमी थी, जिससे यह फल पेड़ों के नीचे गिरकर सड़ जाता था। लेकिन अब बाजार की समझ और बढ़ती मांग के कारण किसानों को इसके सही दाम मिल रहे हैं।

  • अतिरिक्त आय का साधन: धान और अन्य पारंपरिक फसलों के बीच, जामुन की यह सीजनल फसल किसानों को कम लागत में सीधे नगद मुनाफा दे रही है।

  • सैकड़ों परिवारों को रोजगार: जामुन को पेड़ों से तोड़ने, उसकी छंटनी करने और पैकेजिंग के काम में स्थानीय महिलाओं और युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिला है।

विशेषज्ञों की राय: सेहत और स्वाद का बेजोड़ संगम

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जशपुर की जलवायु और मिट्टी जामुन के अनुकूल है। इसके अलावा, जामुन के औषधीय गुणों (जैसे डायबिटीज नियंत्रण) के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण भी शहरी क्षेत्रों में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है। यदि आने वाले समय में यहाँ प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जाए, तो जामुन का पल्प और सिरका बनाकर किसान बारह महीने मोटी कमाई कर सकते हैं।

फिलहाल, पत्थलगांव के बाजारों में जामुन की रौनक और किसानों के चेहरों की मुस्कान यह साफ बयां कर रही है कि मेहनत और सही बाजार मिले, तो पेड़ों से गिरने वाला आम फल भी 'खास' बन सकता है।

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