पूर्व प्रभाव से लागू नहीं होंगे नए नियम
NCTE ने अपने हलफनामे में यह साफ कर दिया है कि किसी भी कानून या नियम को ‘पूर्व प्रभाव’ (Retrospective Effect) से लागू नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि किसी भी शिक्षक की नियुक्ति की वैधता उसी समय के नियमों के आधार पर तय की जाएगी, जिस समय वे सेवा में आए थे। बाद में संशोधित या नए बनाए गए नियमों के आधार पर पुरानी नियुक्तियों को अमान्य या अवैध घोषित नहीं किया जा सकता।
नियुक्ति तिथि के अनुसार पात्रता का वर्गीकरण
NCTE द्वारा प्रस्तुत स्पष्टीकरण के तहत शिक्षकों की नियुक्ति की तारीख के आधार पर पात्रता की स्थिति को तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:
3 सितंबर 2001 से पूर्व नियुक्त शिक्षक: इस समय सीमा से पहले सेवा में आने वाले शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से पूरी तरह मुक्त रखा गया है। उन्हें यह परीक्षा पास करने की कोई जरूरत नहीं है।
3 सितंबर 2001 से 23 अगस्त 2010 के मध्य नियुक्त शिक्षक: इस समयावधि के दौरान नियुक्त हुए शिक्षकों के लिए भी TET अनिवार्य नहीं माना जाएगा, क्योंकि इस दौरान देश में ऐसी कोई परीक्षा प्रणाली लागू ही नहीं थी। इसलिए ये नियुक्तियां भी पूरी तरह वैध रहेंगी।
23 अगस्त 2010 के बाद नियुक्त शिक्षक: इस तारीख को NCTE ने अपनी आधिकारिक अधिसूचना जारी की थी। अतः 23 अगस्त 2010 के बाद प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर नियुक्त होने वाले सभी अध्यापकों के लिए TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य है।
प्रशासनिक भ्रम और मानसिक तनाव से मुक्ति
पिछले लंबे समय से शिक्षक वर्ग में इस बात का डर बना हुआ था कि क्या पुराने शिक्षकों पर भी नए नियम थोपे जाएंगे। इस आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद देश भर के हजारों सेवारत शिक्षकों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार हो गया है। शिक्षा जगत के विशेषज्ञों के मुताबिक, NCTE का यह निर्णय अत्यंत तार्किक और न्यायसंगत है। इससे न केवल शिक्षकों का मानसिक तनाव दूर होगा, बल्कि शिक्षा विभागों में चल रहा प्रशासनिक भ्रम भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।
इस स्पष्टीकरण के बाद अब 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षक वैधानिक रूप से सुरक्षित हैं और उन पर वर्तमान TET नियम प्रभावी नहीं होंगे।

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