नई दिल्ली: भारत में शिशु मृत्यु दर (IMR) लगातार घट रही है, लेकिन लैंगिक असमानता अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में शिशु मृत्यु दर 24 प्रति हजार जीवित जन्म दर्ज की गई है। इसमें लड़कों की दर 24 जबकि लड़कियों की दर 25 है। यानी लड़कियों की मौत का आंकड़ा लड़कों से थोड़ा अधिक है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि औसतन हर 42 नवजात शिशुओं में से एक अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले ही दम तोड़ देता है।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सबसे गंभीर स्थिति
शिशु मृत्यु दर के मामले में दो राज्य विशेष रूप से चिंता बढ़ा रहे हैं। मध्य प्रदेश में कुल IMR 35 दर्ज की गई है, जिसमें लड़कों की दर 35 और लड़कियों की दर 36 है।
छत्तीसगढ़ की स्थिति और अधिक गंभीर है। यहां कुल शिशु मृत्यु दर 36 है — जो पूरे देश में सबसे अधिक है। इस राज्य में लड़कों की दर 35 रह गई, जबकि लड़कियों की मृत्यु दर 38 तक पहुंच गई। यानी यहां लड़कियों की मौत की दर लड़कों से तीन अंक अधिक है।
2024 के प्रमुख राज्यों के आंकड़े इस प्रकार हैं:
| रैंक | राज्य | कुल IMR | पुरुष IMR | महिला IMR |
|---|---|---|---|---|
| 1 | छत्तीसगढ़ | 36 | 35 | 38 |
| 2 | मध्य प्रदेश | 35 | 35 | 36 |
| 3 | उत्तर प्रदेश | 35 | 36 | 35 |
| 4 | मेघालय | 31 | 32 | 29 |
| 5 | असम | 29 | 29 | 29 |
पिछले एक दशक में उल्लेखनीय प्रगति
सकारात्मक पक्ष यह है कि देश ने शिशु मृत्यु दर को कम करने में अच्छी प्रगति की है। वर्ष 2014 में जहां IMR 39 थी, वह 2024 में घटकर 24 रह गई है। यह दर्शाता है कि पिछले 10 वर्षों में काफी सुधार हुआ है।
2019-2024 के बीच ट्रेंड
पिछले पांच वर्षों का आंकड़ा और भी उत्साहजनक है। 2019 में देशभर में शिशु मृत्यु दर 30 थी, जो 2024 में 24 हो गई। लड़कों की दर 30 से घटकर 24 पर आई, जबकि लड़कियों की दर 31 से घटकर 25 रह गई।
मध्य प्रदेश में 2019 में कुल IMR 46 थी (लड़के 49, लड़कियां 43)। छत्तीसगढ़ में उस समय कुल दर 40 थी और दोनों लिंगों की दर बराबर 40 थी। दोनों राज्यों में पिछले पांच वर्षों में सुधार स्पष्ट दिख रहा है, हालांकि लड़कियों की अपेक्षाकृत ऊंची मृत्यु दर अभी भी ध्यान देने वाली बात है। ये आंकड़े SRS 2024 रिपोर्ट पर आधारित हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लक्षित हस्तक्षेप, बेहतर पोषण और लड़कियों की स्वास्थ्य देखभाल पर अतिरिक्त ध्यान देकर इस लैंगिक अंतर को और कम किया जा सकता है।

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