कपिल सिब्बल का मुख्य सवाल
कपिल सिब्बल ने अपनी पोस्ट की शुरुआत एक सीधे सवाल से की — “फिर चुनाव क्यों कराए जाएं?” उन्होंने लिखा कि यदि किसी पार्टी का चुनाव चिह्न आपको संसद तक पहुंचाता है, तो उसी जनादेश को छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने का क्या अधिकार है। सिब्बल के अनुसार, जिस चिह्न पर जनता ने वोट नहीं दिया, उसके साथ जाना मतदाताओं के जनादेश का स्पष्ट अनादर है।
दल-बदल असंवैधानिक है: सिब्बल
सिब्बल ने कहा कि संवैधानिक कानून का कोई भी सिद्धांत इस प्रकार के दल-बदल की अनुमति नहीं देता। उन्होंने इसे अनैतिक, अवैध और असंवैधानिक बताया। सिब्बल का मानना है कि ऐसे मामलों पर अंतिम फैसला अदालत को करना चाहिए।
मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम
सिब्बल की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ सांसदों के नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी ऑफ इंडिया (NCP-I) के माध्यम से भाजपा नीत एनडीए का समर्थन करने की खबरें सामने आ रही हैं।
इसी बीच शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने भी अपनी पार्टी में टूट की कोशिशों और सांसदों को धन के प्रलोभन दिए जाने के आरोप लगाए हैं। इन घटनाओं ने दल-बदल की बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में केंद्र में ला दिया है।
दल-बदल और जनादेश का सवाल
कपिल सिब्बल ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि चुनावी जनादेश का सम्मान होना चाहिए। जब कोई उम्मीदवार किसी खास पार्टी के प्रतीक पर चुनाव लड़ता है और जीतता है, तो बाद में दूसरे दल में जाना मूल जनादेश का उल्लंघन माना जाता है।
उन्होंने कहा कि यह प्रथा न केवल नैतिकता के खिलाफ है बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना को भी कमजोर करती है। सिब्बल का यह रुख विपक्षी दलों में बढ़ती अस्थिरता के बीच आया है, जहां कई नेता और सांसद अपनी मूल पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों की ओर रुख कर रहे हैं।

खबरें नहीं सच का प्रहार
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