पैदल यात्रियों की सुरक्षा पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी सड़क का निर्माण किया जाता है, तो संबंधित एजेंसियों की यह जिम्मेदारी है कि वहां सुरक्षित और सुव्यवस्थित फुटपाथ भी उपलब्ध कराए जाएं। अदालत ने माना कि फुटपाथों की कमी या उन पर अतिक्रमण होने से लोगों को मजबूरन सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
केंद्र सरकार से कानून बनाने की मांग
न्यायालय ने केंद्र सरकार से देशभर में पैदल यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार करने को कहा है। अदालत का मानना है कि शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और पंचायतों की जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है ताकि फुटपाथों का निर्माण, रखरखाव और संरक्षण प्रभावी ढंग से किया जा सके।
स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी बढ़ी
फैसले में कहा गया है कि सड़कों के साथ सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध कराना केवल एक सुविधा नहीं बल्कि नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा विषय है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी नागरिक के पैदल चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संबंधित प्राधिकरणों के खिलाफ कानूनी उपाय भी अपना सकता है।
शहरी विकास नीतियों पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय देश की शहरी विकास और सड़क सुरक्षा नीतियों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। इससे भविष्य में सड़क निर्माण परियोजनाओं में पैदल यात्रियों की सुविधाओं को अधिक महत्व मिलने की संभावना है। साथ ही फुटपाथों पर अतिक्रमण और उनकी खराब स्थिति जैसे मुद्दों पर भी प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित फुटपाथों पर चलना केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, जिसकी रक्षा करना सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।

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