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नई दिल्ली: 'हम भारत के लोग'—यह वाक्य सुनने में जितना गर्व महसूस कराता है, कानूनी तौर पर इसे हासिल करने की प्रक्रिया उतनी ही दिलचस्प और परतों वाली है। अक्सर हमारे मन में सवाल उठता है कि भारत का नागरिक बनने का असली आधार क्या है? क्या सिर्फ यहाँ पैदा हो जाना काफी है, या इसके लिए माता-पिता का भारतीय होना भी जरूरी है?

आइए बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं कि भारतीय नागरिकता कानून (Citizenship Act) के नियम आपके जन्म के साल के हिसाब से कैसे बदलते हैं।

1. जन्म के आधार पर नागरिकता: आपके जन्म का साल तय करता है नियम

भारत में जन्म से नागरिकता मिलने के नियमों को तीन अलग-अलग दौर (Time Periods) में बांटा गया है:

  • 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच: अगर आपका जन्म इस दौरान भारत में हुआ है, तो आप पूरी तरह से जन्म से ही भारतीय हैं। इस दौर में माता-पिता की नागरिकता क्या थी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

  • 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच: इस दौर में नियम थोड़े सख्त किए गए। अगर आप इस बीच पैदा हुए हैं, तो सिर्फ भारत में जन्म लेना काफी नहीं है। आपके माता-पिता में से किसी एक का भारतीय नागरिक होना जरूरी है, और दूसरा व्यक्ति अवैध अप्रवासी (Illegal Immigrant) नहीं होना चाहिए।

  • 3 दिसंबर 2004 के बाद से अब तक: मौजूदा नियम सबसे ज्यादा कड़े हैं। इस तारीख के बाद पैदा हुए लोग तभी जन्म से नागरिकता का दावा कर सकते हैं, जब या तो उनके माता-पिता दोनों भारतीय हों, या फिर माता-पिता में से कोई एक भारतीय हो और दूसरा जन्म के समय अवैध प्रवासी न हो।

सीएए (CAA): शरणार्थियों के लिए विशेष व्यवस्था

नागरिकता के इन बुनियादी नियमों के अलावा, सरकार ने हाल के वर्षों में एक बड़ा बदलाव भी किया है। तीन पड़ोसी देशों—अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश—से प्रताड़ित होकर आए अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता का एक नया रास्ता खोला गया है।

इस नियम के तहत, इन तीन देशों से 31 दिसंबर 2014 तक या उससे पहले भारत आए छह धर्मों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) के लोगों के लिए नागरिकता हासिल करने की एक अलग और विशेष व्यवस्था की गई है, ताकि वे भी सम्मान से भारत के नागरिक बन सकें।

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