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 भारत में कुल प्रजनन दर (TFR) ऐतिहासिक रूप से गिरकर 1.9 हो गई है। दिल्ली और दक्षिणी राज्यों में आबादी असंतुलन का बड़ा खतरा, जानिए इसके पीछे की मुख्य वजहें।

भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास में पहली बार कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Rate) से नीचे दर्ज की गई है। बीते एक दशक में इस आंकड़े में तीव्र गिरावट आई है और यह 2.3 से घटकर अब महज 1.9 पर पहुंच गया है। आमतौर पर जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए प्रतिस्थापन स्तर 2.1 माना जाता है। इससे कम आंकड़ा सीधे तौर पर इस बात का संकेत है कि देश में आने वाली पीढ़ियों की संख्या में कमी आने वाली है।

क्षेत्रीय असंतुलन: दिल्ली और दक्षिणी राज्यों की स्थिति नाजुक

इस जनसांख्यिकीय बदलाव में सबसे चिंताजनक स्थिति देश की राजधानी दिल्ली की है, जहां प्रजनन दर घटकर मात्र 1.2 रह गई है। यह स्तर फिनलैंड जैसे कई विकसित यूरोपीय देशों से भी कम है। इसके अलावा तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में टीएफआर (TFR) 1.3 दर्ज किया गया है, जबकि देश के शहरी क्षेत्रों का औसत 1.5 बना हुआ है। विशेषज्ञों का पूर्व अनुमान था कि उत्तर भारत के अपेक्षाकृत कम विकसित राज्य आबादी को स्थिर होने से रोकेंगे, परंतु अब वे भी दक्षिणी राज्यों की तर्ज पर तेजी से गिरावट दर्ज कर रहे हैं।

'द इकॉनमिस्ट' की एक हालिया रिपोर्ट, जिसे एएफ पोस्ट और एलन मस्क द्वारा भी साझा किया गया है, के अनुसार वर्ष 1950 में भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी और तब प्रति महिला औसत जन्म दर 6 बच्चे थी। आज भारत 1.45 अरब की आबादी के साथ वैश्विक स्तर पर शीर्ष पर है, लेकिन प्रति महिला औसत जन्म दर अब घटकर 1.9 रह गई है।

जनसंख्या नीति में बदलाव और सरकारों की चिंता

बदलते आंकड़ों के बीच सरकारों की प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं। साल 2019 में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'जनसंख्या विस्फोट' को लेकर आगाह किया था, वहीं अब प्रशासनिक अधिकारी चीन जैसी आबादी घटने की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। इस दिशा में कदम उठाते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तीसरे बच्चे के जन्म पर 30,000 रुपये की वित्तीय प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की है। साथ ही, अब स्कूली पाठ्यक्रमों के माध्यम से कम होती आबादी के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाएगी।

सामाजिक दृष्टिकोण और आर्थिक कारण जिम्मेदार

फैमिली वेलनेस और प्लानिंग कोच श्रद्धा पांडेय के अनुसार, इस गिरावट के पीछे महिला शिक्षा और रोजगार की अहम भूमिका है। उच्च शिक्षा और करियर के प्रति जागरूक महिलाएं अब सीमित संतान चाहती हैं। इसके साथ ही काउंसलिंग के लिए आने वाले परिवारों की सोच में भी बदलाव आया है, जहां लोग 'एक ही संतान लेकिन बेहतर परवरिश' की नीति अपना रहे हैं। बच्चों के पालन-पोषण, डायपर से लेकर स्कूल की महंगी फीस जैसे आर्थिक मोर्चे भी लोगों को बड़ा परिवार नियोजन करने से रोक रहे हैं।

श्रद्धा पांडेय आगे बताती हैं कि समाज में पारंपरिक रूढ़िवादिता कम हुई है। अब बेटा-बेटी में अंतर न करने के कारण यदि किसी परिवार में दो बेटियां भी हैं, तो वे वंश बढ़ाने के लिए तीसरे बच्चे का जोखिम नहीं उठाना चाहते। इसके अतिरिक्त, कई आधुनिक जोड़े अब 'नो चाइल्ड पॉलिसी' को प्राथमिकता दे रहे हैं, जहां वे आर्थिक रूप से समृद्ध जीवन तो चाहते हैं परंतु बच्चों की जिम्मेदारी से दूरी बना रहे हैं।

'युवाओं का देश' बनने की ओर अग्रसर भारत के भावी खतरे

आबादी के इस नए रुख के कारण भारत के भविष्य में वृद्धों की आबादी बढ़ने और कार्यशील युवाओं की संख्या घटने का जोखिम पैदा हो गया है। इससे आश्रित आबादी का अनुपात बढ़ेगा और आर्थिक गति पर असर पड़ सकता है। अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2030 तक भारत की कार्यशील आयु वाली आबादी अपने चरम पर होगी। इसके बाद, जनसंख्या वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्ष 2040 के आसपास भारत की जनसंख्या अपने उच्चतम स्तर को छूकर तेजी से नीचे गिरने लगेगी और इस सदी के अंत तक घटकर केवल 1 अरब के आसपास रह जाएगी।

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