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अंतराष्ट्रीय पंडवानी गायिका तीजन बाई के नाम से उनके गांव के सरकारी स्कूल का नाम रखा जायेगा - गजेंद्र यादव (स्कूल शिक्षा मंत्री)

 

रायपुर/दुर्ग: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पटल पर स्थापित करने वाली विख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का रविवार को रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं। उनके अवसान पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने घोषणा की है कि इस महान कलाकार के सम्मान में उनके पैतृक गांव के शासकीय विद्यालय का नामकरण उनके नाम पर किया जाएगा।

शिक्षा मंत्री ने दी श्रद्धांजलि, शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का बदलेगा नाम

शोक संतप्त परिवार ढांढस बंधाने रविवार को स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव दुर्ग जिले के अंतर्गत आने वाले तीजन बाई के पैतृक गांव गनियारी पहुंचे। वहां उन्होंने दिवंगत कलाकार के पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनकी अंतिम यात्रा तथा अंतिम संस्कार में सम्मिलित हुए। इस दौरान आयोजित शोक सभा को संबोधित करते हुए मंत्री ने बड़ी घोषणा की कि गनियारी के स्थानीय शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का नाम अब परिवर्तित कर 'डॉ. तीजन बाई सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय, गनियारी' किया जाएगा। शिक्षा मंत्री के अनुसार, यह निर्णय छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने और आने वाली पीढ़ियों को उनके संघर्षपूर्ण जीवन से प्रेरित करने के लिए एक सच्ची श्रद्धांजलि है।

संघर्षों से भरा सफर: 'पांडवों की आवाज' को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकगायन शैली 'पंडवानी' (जिसका शाब्दिक अर्थ "पांडवों की आवाज" होता है) को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में तीजन बाई का योगदान अद्वितीय रहा है। 1960 के दशक के अंतिम वर्षों में दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव में महज 13 वर्ष की आयु से उन्होंने एक अस्थायी मंच पर महाभारत की कथाएं सुनाना प्रारंभ किया था। उस दौर में पारंपरिक आदिवासी समाज में सार्वजनिक रूप से गाने-बजाने के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ा। हालांकि, इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी कला को नहीं छोड़ा और लोककथा गायन को एक नए जीवंत रंगमंच में तब्दील कर दिया।

तंबूरे की धुन और सशक्त अभिनय से किरदारों में फूंकती थीं जान

तीजन बाई मंच पर हाथ में तंबूरा लेकर अपनी विशिष्ट गायन शैली, सशक्त हाव-भाव, बुलंद आवाज और प्रभावी अभिनय से महाभारत के प्रत्येक चरित्र को सजीव कर देने के लिए विख्यात थीं। उन्होंने प्राचीन कथावाचन कला को नाटकीय स्वरूप, वाद्य संगीत और गायन के अनूठे समन्वय के साथ देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया। उनके चले जाने से छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास के एक गौरवशाली अध्याय का अंत हो गया है, किंतु उनके द्वारा छोड़ी गई कला की विरासत सदैव जीवित रहेगी।

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