तीजन बाई का जाना केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोककला जगत के लिए एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उन्होंने अपनी अनूठी प्रस्तुति, प्रभावशाली अभिनय और ओजपूर्ण गायन से पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को गांवों की चौपाल से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। महाभारत के पात्रों को जिस जीवंतता के साथ वह मंच पर प्रस्तुत करती थीं, वह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।
दुर्ग जिले की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर तीजन बाई ने कठिन संघर्षों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। ऐसे समय में जब पंडवानी पर पुरुष कलाकारों का वर्चस्व माना जाता था, उन्होंने अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास के दम पर इस धारणा को बदल दिया। उनकी कला ने यह साबित किया कि समर्पण और मेहनत के सामने हर बाधा छोटी पड़ जाती है।
भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेंगी।
तीजन बाई के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी शानदार प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी उन्हें भारतीय सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।आज उनकी आवाज़ भले ही हमेशा के लिए शांत हो गई हो, लेकिन तंबूरे की थाप पर गूंजती उनकी पंडवानी, महाभारत की अमर कथाएं और भारतीय लोकसंस्कृति के प्रति उनका समर्पण सदियों तक लोगों के दिलों में जीवित रहेगा। तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की ऐसी पहचान थीं, जिन्होंने अपनी कला से पूरी दुनिया को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि से परिचित कराया।

खबरें नहीं सच का प्रहार
0 Comments