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नहीं थम रहा वक्फ बोर्ड गठन का बवाल, अब इस बड़े समुदाय ने खोला मोर्चा!

 

M.P./ मध्य प्रदेश में वक्फ बोर्ड के गठन को लेकर शुरू हुआ राजनीतिक और सामाजिक गतिरोध अब और गहराता जा रहा है। राज्य सरकार द्वारा बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किए जाने के फैसले के खिलाफ अब शिया मुस्लिम समुदाय ने भी खुलकर मोर्चा खोल दिया है। आल ए मोहम्मद शिया जामा मस्जिद के इमाम ए जुमा, मौलाना सैयद अजहर हुसैन रिजवी ने इस संबंध में अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने प्रशासन से हिंदू सदस्यों की नियुक्ति को तत्काल निरस्त करने और उनके स्थान पर शिया समुदाय के प्रतिनिधियों को बोर्ड में जगह देने की पुरजोर मांग की है।

गरीब मुसलमानों के कल्याण के लिए समर्पित हैं वक्फ संपत्तियां: मौलाना रिजवी

Waqf Board Controversy के इस संवेदनशील घटनाक्रम पर प्रकाश डालते हुए मौलाना सैयद अजहर हुसैन रिजवी ने वक्फ संपत्तियों के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देश के तत्कालीन नवाबों, राजाओं और समृद्ध परिवारों ने ये संपत्तियां गरीब मुसलमानों की शिक्षा, आवास व्यवस्था और सामाजिक उत्थान के उद्देश्य से दान की थीं। धार्मिक और सामाजिक कल्याण के लिए दी गई इन संपत्तियों के प्रबंधन और संचालन का अधिकार केवल मुस्लिम समुदाय के पास ही होना चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने बोर्ड में आनुपातिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए कहा कि वक्फ का सीधा सरोकार संपूर्ण मुस्लिम समाज से है। इस व्यवस्था को समावेशी बनाने के लिए बोर्ड में कम से कम एक शिया समाज के प्रतिनिधि को आवश्यक रूप से शामिल किया जाना चाहिए था।

मोहन सरकार के फैसले पर विपक्ष और मुस्लिम नेताओं के सवाल

गौरतलब है कि मोहन सरकार ने 4 जुलाई 2026 को एक आधिकारिक आदेश जारी कर इंदौर के मनोज मालपानी और गुना जिले के अनिमेष भार्गव को मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के सदस्य के रूप में नियुक्त किया था। सरकार के इस कदम का मुस्लिम समुदाय के विभिन्न नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी कड़ा विरोध किया है।

इस विवाद के मुख्य कानूनी और राजनीतिक बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • न्यायालय में लंबित मामला: विरोध कर रहे नेताओं का तर्क है कि नए अधिनियम के कई प्रमुख प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाएं वर्तमान में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के समक्ष विचाराधीन हैं।

  • गठन में जल्दबाजी पर सवाल: विधायक आरिफ मसूद ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब यह विषय न्यायालय के अधीन है, तो नए बोर्ड के गठन को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है।

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