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देश भर में NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी को लेकर फैला आक्रोश आखिरकार रंग लाया। छात्र आंदोलन के लगातार बढ़ते दबाव के बाद 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) की सभी प्रमुख मांगें मान ली हैं। आगामी विधानसभा चुनावों और देश के युवाओं (Gen-Z) की नाराजगी के राजनीतिक असर को देखते हुए सरकार को यह बड़ा फैसला लेना पड़ा।


CJP की मांगें और सरकार का फैसला

मई में सोशल मीडिया पर एक व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ सीजेपी आंदोलन जून तक जंतर-मंतर पर एक मजबूत मोर्चे में बदल गया। छात्रों के इस गुट ने सरकार के सामने तीन मुख्य मांगें रखी थीं:

  • शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: धर्मेंद्र प्रधान का पद छोड़ना।

  • मुआवजे की घोषणा: NEET विवाद के कारण जान गंवाने वाले अभ्यर्थियों के परिजनों को 1-1 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता।

  • केस वापसी: 20 मार्च को 'संसद चलो' मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी FIR रद्द करना।

आंदोलन के उग्र रूप को देखते हुए सरकार ने इन सभी मांगों को हरी झंडी दे दी है।

2014 से, बीजेपी मुश्किल हालात से निपटने के लिए जानी जाती रही है क्योंकि हर मुद्दे, खासकर राजनीतिक मुद्दों पर इस्तीफ़ा देना ज़रूरी नहीं होता. सरकार ज़िम्मेदारी तय करने और सुधार करने में पक्का यकीन रखती है. प्रधान ने दोबारा परीक्षा करवाकर ठीक यही किया और अधिकारियों ने आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप तय करने के लिए तेज़ी से कदम उठाए… लेकिन इस विरोध प्रदर्शन का गलत इस्तेमाल उन लोगों और राजनीतिक विरोधियों ने किया जो सरकार और उसके एजेंडे को पटरी से उतारना चाहते हैं

युवाओं का गुस्सा और आगामी चुनाव

बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व को सबसे ज्यादा चिंता युवा वोटरों यानी 'जेन-जी' की नाराजगी को लेकर थी। अगले साल पांच राज्यों, खासकर पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील सूबों में विधानसभा चुनाव होने हैं। युवाओं का यह वर्ग किसी खास जाति या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, इसलिए इनकी अनदेखी करना बड़ा नुकसान पहुंचा सकती थी।

विपक्ष भी इस मुद्दे को भुनाकर संसद का कामकाज ठप करने की तैयारी में था। ऐसे में सरकार के पास बातचीत का रास्ता लगभग बंद हो चुका था।

सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट और संघ का रुख

फैसले के पीछे सुरक्षा एजेंसियों की खुफिया जानकारी भी एक बड़ी वजह बनी। एजेंसियों ने सप्ताहांत में हिंसा और सामाजिक अशांति फैलने की आशंका जताई थी। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी सरकार को छात्रों से संवाद करने और व्यवस्था में सुधार लाने की सलाह दी थी।


RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी संकेत दिया था कि आज का युवा केवल आदेश मानने के बजाय तर्क और सवाल पूछने में यकीन रखता है। आखिरकार, किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने और युवाओं के गुस्से को शांत करने के लिए सरकार ने रणनीतिक रूप से कदम पीछे खींचने का निर्णय लिया।

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