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 देश की शीर्ष अदालत ने नागरिकता और मतदाता सूची को लेकर एक नजीर बनने वाला फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा है कि भारत का निर्वाचन आयोग यह तय करने का अधिकार नहीं रखता कि कौन देश का नागरिक है और कौन नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) प्रक्रिया के जरिए यदि किसी का 'वोटर लिस्ट से नाम हटना' सामने आता है, तो इसे उस व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का खात्मा नहीं माना जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन को लेकर दायर याचिका पर यह टिप्पणी की। पीठ ने रेखांकित किया कि चुनाव आयोग के पास वोटर लिस्ट की देखरेख का पूरा जिम्मा है। वह तकनीकी आधार पर नाम जोड़ने या हटाने के फैसले ले सकता है। मगर, नागरिकता का निर्धारण करना उसके कार्यक्षेत्र से बाहर की बात है।

सुप्रीम कोर्ट ने तय की चुनाव आयोग की सीमाएं

अदालत ने निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करते हुए एक नया नियम तय किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर मतदाता सूची में संशोधन के वक्त आयोग को किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता पर कोई गंभीर शक होता है, तो वह इस मामले को खुद निपटाने के बजाय सीधे केंद्र सरकार (केंद्रीय गृह मंत्रालय) के पास भेजेगा। जब तक नागरिकता कानून (सिटिजनशिप एक्ट) के तहत तय अथॉरिटी इस पर अंतिम फैसला नहीं कर लेती, तब तक संबंधित व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का दर्जा कानूनन कायम रहेगा।

पश्चिम बंगाल में 58 लाख वोटरों का मामला

यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने एक जनहित याचिका दाखिल कर दावा किया कि राज्य में जारी विशेष अभियान के तहत 58 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने दलील दी कि चुनाव आयोग विधानसभा क्षेत्रवार खारिज हुए दावों और लंबित अपीलों का डेटा साझा नहीं कर रहा है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि मतदाता सूची से नाम कटने के कारण गरीब तबके के लोगों को राशन (PDS) और जाति प्रमाण पत्र जैसी बुनियादी सरकारी सुविधाओं से हाथ धोना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव पैनल को नोटिस जारी कर क्षेत्रवार आंकड़े पेश करने का निर्देश दिया है।

25 अगस्त को होगी मामले की अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद से जुड़ी सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़ दिया है। इनमें पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर की गई एक अन्य लंबित अर्जी भी शामिल है। इस बड़े और संवेदनशील कानूनी मुद्दे पर अब अदालत आगामी 25 अगस्त को एक साथ अंतिम सुनवाई करेगी।

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