नई दिल्ली: औद्योगिक क्षेत्र की धूल और मशीनों की गड़गड़ाहट के बीच काम करने वाले 38 वर्षीय रमेश कुमार पिछले आठ वर्षों से हर 11 महीने बाद अपनी नौकरी का अनुबंध (Contract) रिन्यू करवाते आए हैं। हर बार कंपनी बदलती रही, काम का ठिकाना बदलता रहा, लेकिन रमेश के हाथ में कभी ग्रैच्युटी का वह पैसा नहीं आया, जो किसी स्थायी कर्मचारी को उसके वर्षों के पसीने के बदले मिलता है। वजह सिर्फ एक थी—कानूनन किसी एक जगह 5 साल लगातार टिकने की शर्त, जिसे ठेका प्रथा अक्सर तीन या चार साल में ही तोड़ देती थी।
लेकिन आज रमेश जैसे देश के करोड़ों फिक्स्ड-टर्म और कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों के लिए हालात बदल चुके हैं। सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code) के प्रभावी नियमों ने उस पुरानी दीवार को ढहा दिया है, जो स्थायी और अनुबंध कामगारों के बीच दशकों से खड़ी थी। अब किसी भी संस्थान में मात्र एक साल की निरंतर सेवा पूरी करने पर मजदूर को आनुपातिक (Pro-rata) आधार पर ग्रैच्युटी पाने का वैधानिक अधिकार मिल गया है।
पसीने का मूल्य, भेदभाव का अंत
परंपरागत नियमों के तहत 1972 के पेमेंट ऑफ ग्रैच्युटी एक्ट में पांच साल की अनिवार्य सीमा थी। ठेकेदारी व्यवस्था में कंपनियां अक्सर मजदूरों को 4 साल 10 महीने में हटा देती थीं या उनका कॉन्ट्रैक्ट री-शफल कर देती थीं, जिससे मजदूर अपनी मेहनत के एक बड़े हक से वंचित रह जाते थे।
नए प्रावधानों को इस प्रकार से समझा जा सकता है:
1 साल पर पात्रता: फिक्स्ड-टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए कामगार यदि 12 महीने की सेवा पूरी कर लेते हैं, तो अनुबंध समाप्त होने पर उन्हें ग्रैच्युटी का भुगतान अनिवार्य रूप से करना होगा।
समान काम, समान अधिकार: कानून स्पष्ट करता है कि फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों के काम के घंटे, छुट्टियां और मेडिकल सुविधाएं किसी भी स्थायी कर्मचारी से कमतर नहीं आंकी जा सकतीं।
डिजिटल और पारदर्शी रिकॉर्ड: ई-श्रम और यूएएन (UAN) आधारित ट्रैकिंग के जरिए मजदूरों के काम का रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है, जिससे ठेकेदार उनकी सेवा अवधि में हेरफेर नहीं कर सकते।
"अब बेटी की पढ़ाई के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा"
मानेसर की एक ऑटो पार्ट्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में काम करने वाले दिनेश सिंह कहते हैं, "हमारे जैसे मजदूरों के लिए ग्रैच्युटी सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच है। जब एक साल का कॉन्ट्रैक्ट खत्म होता था, तो अगले काम की तलाश के दौरान जेब पूरी तरह खाली हो जाती थी। अब अगर 1 साल की मेहनत का भी हिसाब मिलेगा, तो कम से कम बच्चों की स्कूल फीस या अचानक बीमारी के लिए किसी साहूकार के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।"
श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल कागजी सुधार नहीं है, बल्कि देश के अनौपचारिक श्रम बल को औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने की दिशा में एक मानवीय कदम है। जहां उद्योग जगत को लचीलापन मिला है, वहीं सबसे निचले पायदान पर खड़े कामगार को उसकी निष्ठा और श्रम का वास्तविक मूल्य मिला है।
यह सुधार उन हाथों को एक गरिमापूर्ण भरोसा देता है, जिनकी मेहनत पर देश के बुनियादी ढांचे और उद्योगों की इमारत खड़ी है।
खबरें नहीं सच का प्रहार


No comments:
Post a Comment