दुर्गम इलाकों में सेवा और मानदेय की विषमता
दुर्ग में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संघ के प्रतिनिधियों ने अपनी समस्याओं को मीडिया के सामने रखा। शिक्षकों ने कहा कि वे अपनी मर्जी से आंदोलन के रास्ते पर नहीं उतरे थे। वर्ष 2016 से तय मानदेय आज की बढ़ती महंगाई के दौर में परिवार चलाने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है।
संघ के अनुसार, कई शिक्षक रोजाना 25 किलोमीटर तक पैदल चलकर और नक्सल प्रभावित संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी जान जोखिम में डालकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इन क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था का ढांचा मजबूत करने में अतिथि शिक्षकों का बड़ा योगदान रहा है, फिर भी उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में काफी कम भुगतान किया जा रहा है।
वेतन अंतर और प्रमुख मांगें
वर्तमान व्यवस्था में नियमित शिक्षकों को लगभग एक लाख रुपये और स्वामी आत्मानंद स्कूलों के शिक्षकों को 38 हजार रुपये तक प्रतिमाह मिलते हैं। इसके विपरीत, अतिथि शिक्षकों को महज 20 हजार रुपये दिए जाते हैं। शिक्षकों का आरोप है कि उनसे साल के 12 महीने काम लिया जाता है, लेकिन मानदेय केवल साढ़े दस महीने का ही मिलता है।
अतिथि शिक्षकों की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
पूरे 12 महीने का नियमित मानदेय देना।
'समान काम-समान वेतन' का नियम लागू करना।
13 आकस्मिक अवकाश (CL) और मातृत्व अवकाश की सुविधा।
भविष्य में नियमितीकरण को लेकर स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनाना।
मंत्रालयी आश्वासन और पुलिस कार्रवाई पर नाराजगी
हड़ताल प्रभारी धर्मेंद्र वैष्णव ने बताया कि विभागीय मंत्री और सचिव स्तर से उन्हें मांगों पर सकारात्मक पहल का भरोसा मिला है। शासन की ओर से कैबिनेट बैठक में इन विषयों को रखकर समाधान निकालने की बात कही गई है। धर्मेंद्र वैष्णव के मुताबिक, "प्रशासन ने हमसे सहयोग की अपील की है। इसी आश्वासन के आधार पर हमने फिलहाल आंदोलन रोकने का निर्णय लिया है।"
इसके साथ ही, शिक्षकों ने आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई और बदसलूकी पर गहरी नाराजगी जताई। उनका कहना था कि जब शासन स्तर पर बातचीत चल रही थी, तब पुलिस को दंडात्मक रवैया नहीं अपनाना चाहिए था।
खबरें नहीं सच का प्रहार


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