क्या है पूरा विवाद और संविलियन का गणित?
छत्तीसगढ़ में पहले हजारों शिक्षक पंचायत और नगरीय निकायों के अधीन 'शिक्षाकर्मी' के रूप में सेवाएं दे रहे थे। राज्य सरकार ने 1 जुलाई 2018 को इन शिक्षकों का स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन (शासकीय सेवा में विलय) किया था। शिक्षकों का कहना था कि चूंकि वे कई वर्षों तक सेवाएं दे चुके हैं, इसलिए उनकी पेंशन और अन्य सुविधाओं के लिए सेवा की गिनती 2008 या उनकी पहली नियुक्ति के दिन से की जानी चाहिए।
हालांकि, नए आदेश में सरकार ने रुख साफ कर दिया है:
शिक्षक (एलबी) संवर्ग के सभी वित्तीय व सेवा लाभों की गणना 1 जुलाई 2018 से ही होगी।
2018 से पहले पंचायत या निकायों में दी गई सेवाओं को शासकीय सेवा नहीं माना जाएगा।
पुरानी अवधि को जोड़कर पेंशन या अन्य प्रशासनिक लाभ देने का प्रावधान नहीं है।
उदाहरण से समझिए शिक्षकों का नुकसान
अगर किसी शिक्षक की नियुक्ति साल 2008 में शिक्षाकर्मी के रूप में हुई थी और उनका संविलियन 1 जुलाई 2018 को हुआ, तो 2038 में रिटायर होने पर सरकार उनकी कुल सेवा 30 साल नहीं, बल्कि केवल 20 साल (2018 से) ही दर्ज करेगी।
इसी तरह, अगर शिक्षक 'A' 2007 में और शिक्षक 'B' 2010 में भर्ती हुए थे, लेकिन दोनों का संविलियन 2018 में हुआ, तो सरकार के नए नियम के तहत दोनों की सरकारी सेवा की शुरुआत एक ही तारीख (1 जुलाई 2018) से मानी जाएगी।
हाई कोर्ट के निर्देश और सरकार का तर्क
यह मामला बिलासपुर हाई कोर्ट भी पहुंचा था। 23 जनवरी 2026 को हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह संवैधानिक और मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इस पर उचित फैसला ले।
समीक्षा के बाद सरकार ने तर्क दिया कि 1 जुलाई 2018 से पहले ये शिक्षक सीधे तौर पर राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं थे, बल्कि निकायों के अधीन थे। इसलिए उस अवधि को पेंशन योग्य शासकीय सेवा में शामिल नहीं किया जा सकता।
आगे कानूनी लड़ाई के आसार
सरकार के इस रुख से लाखों शिक्षकों में मायूसी है। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में स्पष्ट किया था कि यदि शिक्षक सरकार के निर्णय से असंतुष्ट रहते हैं, तो वे दोबारा अदालत की शरण ले सकते हैं। ऐसे में इस फैसले के खिलाफ एक बार फिर कानूनी जंग छिड़ने की पूरी संभावना है।
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