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दशकों पुराने चर्चित बोफोर्स तोप सौदा भ्रष्टाचार मामले में कानूनी लड़ाई अब हमेशा के लिए खत्म हो गई है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश रक्षा कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के फैसले को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत के इस फैसले के साथ ही इस प्रकरण को दोबारा कानूनी प्रक्रिया में लाने की तमाम संभावनाएं लगभग समाप्त हो गई हैं।

मामले को लंबा खींचने से अदालत का इनकार

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से चार सप्ताह की मोहलत मांगी, ताकि याचिका में से दिवंगत श्रीचंद पी. हिंदुजा और गोपीचंद पी. हिंदुजा के नाम हटाकर संशोधन किया जा सके। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने समय देने की मांग को खारिज करते हुए कहा कि इस ऐतिहासिक मामले को अब और अधिक लंबा नहीं खींचा जा सकता।

बोफोर्स सौदे का इतिहास और राजनीतिक भूचाल

बोफोर्स विवाद की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई थी, जब भारत सरकार ने स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी 'एबी बोफोर्स' के साथ लगभग 1,437 करोड़ रुपये का समझौता किया था। इस समझौते के तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपों की खरीद की जानी थी।

वर्ष 1987 में स्वीडिश रेडियो ने एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं, मध्यस्थों और रक्षा अधिकारियों को भारी रिश्वत (कमीशन) दी गई थी। इस खुलासे के बाद भारत की राजनीति में भारी भूचाल आ गया था और यह देश के इतिहास के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मामलों में शुमार हो गया।

इसके बाद वर्ष 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए हिंदुजा बंधुओं और एबी बोफोर्स कंपनी के खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक आरोपों को निरस्त कर दिया था, जिसे हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

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