समझौते की पेशकश और ईरान का सख्त रुख
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर संभावित सैन्य हमलों को टालने का आदेश जारी किया है। उन्होंने दावा किया कि मध्य पूर्व के कुछ देशों और ईरान की ओर से समझौते का प्रस्ताव मिलने के बाद यह फैसला लिया गया। इस प्रस्ताव में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को तुरंत खोलने और परमाणु खतरे को खत्म करने की शर्तें शामिल हैं।
हालाँकि, ईरान का रुख इसके बिल्कुल विपरीत है। 29 जुलाई को जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए मिसाइल हमले के बाद ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और कार्यवाहक रक्षा मंत्री माजिद इब्न अल-रेजा ने साफ किया कि उनका देश किसी भी अमेरिकी कार्रवाई का कड़ा जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप के इस कदम को ईरान अपनी कूटनीतिक जीत के तौर पर देख रहा है।
युद्ध लंबा खींचने के पीछे ईरान की रणनीति
ईरान इस तनाव को तुरंत खत्म करने के बजाय इसे लंबा खींचकर अमेरिका पर चौतरफा दबाव बनाना चाहता है:
ग्लोबल ऊर्जा संकट: होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। इसे बाधित कर ईरान वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा रहा है, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों पर भारी आर्थिक दबाव बन रहा है।
प्रतिबंध हटाने की मांग: तेहरान इस दबाव का इस्तेमाल अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को स्थायी रूप से खत्म करवाने के लिए कर रहा है।
फ्रीज संपत्तियों की वापसी: विदेशी बैंकों में अटकी अपनी 100 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति को अनफ्रीज कराना भी ईरान का मुख्य लक्ष्य है।
विशाल तेल भंडार और घरेलू चुनौतियां
ईरान के पास करीब 209 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार मौजूद है, लेकिन कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से वह इसका सही फायदा नहीं उठा पा रहा है। देश के भीतर बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक सुस्ती से ध्यान हटाने के लिए भी यह संघर्ष तेहरान के लिए एक जरिया बना हुआ है।
खबरें नहीं सच का प्रहार


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